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Sunday, 22 July 2012

अंजानो से अपनी पहचान पूछता हु


जिनके दिलो में जगह नहीं उनसे मकान  पूछता हु
आखिर में किन अंजानो से अपनी पहचान पूछता हु

जिन्होंने अपने मतलब के लिए सदा ही घोपे खंजर
जिनके खेत हरे होकर भी धरतिया सदा ही थी बंजर
जो कभी किसी को एक भी दाना दान नहीं करते
जो अपने आगे उस खुदा का भी गुणगान नहीं करते
पागल हु जो उनके दिलो में खुद के लिए सम्मान पूछता हु
आखिर में किन अंजानो से अपनी पहचान पूछता हु

जिन्होंने रस्ते के दख्त काट सरो से छीन ली छाया
जिन्होंने सिवा रकाफतो के अब तक कुछ ना कमाया
ले रहे देखो जहा भाई अपने भाई की जान
जो नहीं समझते हिन्दू मुस्लिम एक समान
पागल हु जो एक हिन्दू  से में अजान पूछता हु
आखिर में किन अंजानो से अपनी पहचान पूछता हु

जो कभी उस सहीद दिवस पर आंखे नम नहीं करते
किसी के जले पर जो कभी मरहम नही भरते
जो नहीं रखते किसी के जीने या मरने से ताल्लुक
जो खुद ही छोड़ के जाना चाहते हे अपना मुल्क
पागल हु जो उनसे उनके मुल्क का नाम हिंदुस्तान पूछता हु
आखिर में किन अंजानो से अपनी पहचान पूछता हु

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